लौट आया बचपन

by | Dec 19, 2019 | Entertainment, Stories | 0 comments

स्टोरीज़ आपके परिवार या परिवेश की ही एक कल्पना है। यहीं से उदाहरण के रूप में कुछ कहानी प्लॉट्स लिए जाते हैं। यदि हम बात करें आज के परिवेश की तो समाज में पेरेंट्स की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। संस्कार भी ज़रूरी हैं लेकिन आवश्यक है कि फैमिली वैल्यूज़ बच्चों तक ज़रूर पहुंचे। ऐसी ही एक विचारधारा को कहानी के रूप में व्यक्त किया है श्रीमती सुषमा दुबेजी ने। आप एक स्वतंत्र लेखिका हैं, साथ ही एक समाज सेविका के रूप में अपनी सेवायें देती रहती हैं। लीजिये पढ़िए सुषमाजी की कहानी ‘लौट आया बचपन’।

स्कूल से आकर शौर्य ने बेग पटका और काउच पर लेट गया। आया ने पूछा ‘बाबा खाना लगा दूं’? वह बोला ‘नो, मुझे भूख नहीं है’…..

उसे नींद भी नहीं आ रही थी उसने एक निगाह घड़ी की ओर डाली 5 बज रहे थे। वह मन ही मन बुदबुदाया ‘ओह! अभी ममा को आने में पूरे 3 घंटे बाकी हैं और पापा तो उसके सोने के बाद ही घर आते हैं’….

वह उठकर बालकनी में खड़ा होकर आते-जाते लोगों को देखने लगा। सामने झोपड़ी में एक गरीब परिवार रहता है जहां बच्चों के मां-पिताजी मिलकर दुकान चलाते हैं। शौर्य हमेशा उस परिवार की गतिविधियों को देखा करता था। उसे दिन-भर उन सबका मिलकर रहना बहुत अच्छा लगता था। वहां एक बूढ़ी दादी भी रहती थी जो बच्चो को अपनी खाट पर सुलाकर थपकाती थी। कभी उन्हे नहला-धुलाकर तैयार कर देती थी, और कभी-कभी उन्हें कहानी भी सुनाती थी…..

वे दोनों भाई-बहन कभी छुपन-छुपाई खेलते तो कभी पकड़म-पकड़ाई । शौर्य का मन करता झटपट सीढियां उतरकर भाग जाए और उन बच्चों के साथ खेले। लेकिन वो ऐसा कर नहीं सकता था क्योंकि एक बार उसने ऐसा किया था तब ममा-पापा ने उसे बहुत डांटा था। उन्होंने कहा ‘वे गंदे और गरीब लोग हैं, तुम्हें उनके साथ नहीं खेलना चाहिए, तुम अन्वी और अनय के साथ खेला करो’। पर वो लोग कोचिंग से 7 बजे घर आते हैं तब तक बेचारा बालकनी में ही खड़ा रहता है…..

शौर्य ने देखा उनका एक बच्चा मां की गोद में बैठकर केला खा रहा था और दूसरा पापा के पास था। उसने मन ही मन सोचा ‘काश मेरे पापा- ममा भी कुछ ऐसा ही करते, मम्मी उसे गोद में उठाती और पापा अपने साथ मार्केट ले जाते’….

‘यदि दादा-दादी साथ रहने आ जाए तो मैं पापा-ममा को कभी परेशान भी नहीं करूंगा’…. दृश्यों की कल्पना मात्र से 5 वर्षीय शौर्य रोमांचित हो उठा। सोचते-सोचते वह बेड पर आकर लेट गया और उसे नींद लग गई , वह सपने में भी इसी तरह की कल्पनाएं कर रहा था….

अब तो शौर्य के स्कूल से भी कभी-कभी शिकायतें आने लगी थी। उसने कई बार सोचा सास–ससुर को साथ बुला कर रखे, लेकिन पुराने ख्यालों के होने की वजह से वह उनके सामने वेस्टर्न ड्रेसेस नहीं पहन पाती थी। फिर उन्हे अभिनव का शराब पीना, पार्टियों में जाना भी उन्हें पसंद नहीं था। उनके साथ शुभ्रा को भी पूजा–पाठ, रीत-रिवाज मानने पड़ते थे इसलिए वह कई बार ऑफिस लेट पहुँच पाती थी। ये सब सोच कर शुभ्रा कुछ तय नहीं कर पाई और समय अपनी गति से चलता जा रहा था। इधर ऑफिस में भी उसका काम बढ़ता जा रहा था।  

इस बार दशहरे पर शुभ्रा के पापा-मम्मी कुछ दिनों के लिए रहने आए। उनको पाकर शौर्य चहकने लगा था। वह दिन-भर नाना-नानी को करतब दिखाता, कहानी सुनता, ढेर सारी बातें करता, नानू उसका घोड़ा बनते, नानी उसे मनपसंद चीज़ें बनाकर खिलाती…..

शुभ्रा भी बेफिक्र हो गई थी, लेकिन जैसे-जैसे उन लोगों के जाने का समय निकट आ रहा था शुभ्रा की चिंता फिर वहीं की वहीं। शुभ्रा की मां बहुत अनुभवी और समझदार थी, उन्होंने बातों-बातों में शौर्य की समस्या भांप ली थी…..

उन्हें कुछ ऐसी बात पता चली कि अभिनव और शुभ्रा के होश उड़ गए। शौर्य के अकेलेपन का फायदा उसके स्कूल में एक बड़ी क्लास के बच्चे ने उठाया। पहले तो उसने उसे प्यार से घुमाने और खेलने का लालच दिया, फिर अकेले में परेशान करने लगा, वह उसे अपने मोबाइल में अश्लील वीडियो दिखाता था। उस लड़के ने शौर्य को धमकी दी थी कि किसी को बताया तो तुम्हें स्कूल की छत से नीचे फेंक दूंगा…..

इस बात के लिए शुभ्रा और अभिनव को मम्मी–पापा ने बहुत डांट पिलाई। मां बोली, ‘वाह मेरे बच्चों कमाने की होड़ में बच्चे के बचपन को खोने चले थे। तुम लोगों ने उसे भौतिक सुख–सुविधाएं तो सब दी किन्तु उसका बचपन मानो छीन ही लिया, कितना अकेला हो गया मेरा बच्चा, वो तो गनीमत जानो कि बात अधिक आगे तक नहीं गई, वरना कोई हादसा भी हो सकता था’……

दोनों बहुत डर गए थे उन्हें तुरंत अपनी गलती स्वीकार की और स्कूल प्रिन्सिपल से मिले और उस लड़के कि शिकायत की। प्रिन्सिपल ने उन्हें उस बच्चे को स्कूल से निकलने का आश्वासन दिया। स्कूल से आकर शुभ्रा ने ऐलान किया कि वो अपने सास-ससुर को यहीं बुलाकर रखेगी और अपनी जॉब छोड़ देगी या चेंज कर लेगी ताकि बच्चे को समय दे सके…..

वह अपने लाड़ले के लिए जितना त्याग कर सकती है करेगी लेकिन हां अभिनव को भी लेट नाईट पार्टियों और शराब से तौबा करनी पड़ेगी। अभिनव ने भी हां में हां मिलाई। शुभ्रा ने शौर्य से भी प्रॉमिस किया कि वह उसके लिए अस्पताल से एक प्यारा भाई या बहन लाएगी। दीपावली पर शौर्य को दादा-दादी के रूप में अनमोल तोहफा मिल गया था। अब वो बहुत खुश रहने लगा था……

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श्रीमती सुषमा दुबेजी

श्रीमती सुषमा दुबेजी

स्वतंत्र लेखिका