ध्यान रखें जब निकलने वाले हों बेबी टीथ

by | Jun 17, 2020 | Love & Life, Parenting | 0 comments

पैरेंटिंग का एक मज़ेदार दौर तब भी आता है जब आपके बच्चे के पहली बार दांत निकलते हैं। बेबी टीथ का निकलना जहां एक उत्सुकता पैदा करता है वहीं कुछ परेशानियां भी लाता है। ऐसे में शुरुआती दौर में ही विकास के चरण से गुज़र रहे शिशु की तकलीफ पैरेंट्स को भी असमंजस में डाल देती है। वे समझ नहीं पाते कि क्या किया जाए। देखा जाये तो मिल्क टीथ की केयर करना भी बहुत ज़रुरी होता है। विशेषज्ञ ये भी कहते हैं कि इस समय बच्चों की डाइट में फ्लोराइड की मात्रा संतुलित की जाये। बच्चों के चिड़चिड़ेपन को दूर करने के लिए आप पैसिफायर की मदद भी ले सकते हैं। इस बारे में अधिक जानकारी दे रही हैं डॉक्टर प्रचिता अग्रवाल जो एम्स दिल्ली में बतौर पीडोडोंटिस्ट के रूप में कार्यरत हैं।

बेबी टीथ के समय होते हैं कईं डाउट

बच्चों में मिल्क टीथ का आना जल्द सम्पन्न होने वाली प्रक्रिया नहीं है। यह धीरे-धीरे और अधिकांशतः थोड़ी तकलीफ के साथ पूरी होती है। जब पहला बेबी टीथ मसूढ़ों के बाहर झांकने लगता है तो यह पूरे परिवार के लिए उत्सुकता, आनंद और थोड़ी-सी बैचेनी का भी सबब बन जाता है। अधिकांश बेबीज़ का पहला दांत 6 माह की उम्र में आ जाता है लेकिन हर बच्चे में यह स्थिति समान हो यह कतई ज़रूरी नहीं। तो यदि आपके बेबी का दांत छठे माह में नही आया तो घबराएं नहीं। ये प्रक्रिया 3-14 माह तक कभी भी शुरू हो सकती है। इसके पीछे कई सारे कारण भी हो सकते हैं। जैसे, बच्चे के माता-पिता के दांत किस उम्र में आये थे या बच्चा प्रीमैच्योर तो नही था? आदि। इसी तरह बेबी टीथ के समय हर बच्चा भिन्न प्रतिक्रिया दे सकता है। इसे लेकर भी कोई तुलना न करें। कुछ बच्चे चिड़चिड़ाहट या लार टपकने जैसे लक्षण भी दर्शा सकते हैं तो कुछ में कोई लक्षण नजर नही भी आता।

इस तरह बनती है बेबी टीथ की संरचना

बेबीज़ के दांत अक्सर जोड़े में आते हैं। आमतौर पर सबसे पहले नीचे की ओर बीच के दो दांत आते हैं। करीब एक महीने बाद ऊपर के बीच के दो दांत आते हैं। हालांकि कई बार नीचे या ऊपर में से किसी जगह एक साथ चार दांत भी पहले आ सकते हैं। दांत आने की यह प्रक्रिया साल भर या इससे कुछ समय बाद तक भी चल सकती है। इस दौरान बच्चे को थोड़ा अतिरिक्त समय देने की ज़रूरत होती है। चूंकि इस समय बच्चे के मुंह में लार अधिक बनने लगती है अतः वह बार-बार अपने हाथ की उंगलियों को मुंह में डालता है या मुट्ठी को मुंह में डालने की कोशिश करता है। कुछ डॉक्टर छह महीने की उम्र से बच्चे की डाइट में फ्लोराइड की मात्रा को निश्चित करने की भी सलाह देते हैं। यह टूथ डिके से बचाव कर सकता है। इसके बारे में अपने डॉक्टर से सलाह अवश्य लें।

मिल्क टीथ का ध्यान रखना बहुत ज़रुरी है

वैसे तो मिल्क टीथ भी एक बार टूटते ही हैं। लेकिन अगर आप इस समय मिल्क टीथ की अच्छे से देखभाल कर लेंगे तो वो खराब होने से बच सकते हैं। जैसे दूध के दांत आते ही आप एक बार किसी अच्छे विशेषज्ञ को दिखा लीजिये। इससे आपको आगे के लिए भी सलाह मिल जाएगी।

फ्लोराइड को संतुलित करें

दांत आने की प्रक्रिया में बच्चे के शरीर का तापमान बढ़ना एक आम बात है, इसे लेकर चिंता न करें और डॉक्टर से पूछकर ही इसके लिए दवाई दें। जाहिर है कि बच्चे के लिहाज से थोड़ा दर्द भी अधिक होगा और इस प्रक्रिया में मसूढ़ों में सूजन भी होगी, ऐसे में उसे प्यार से अपने पास चिपकाएं। मां या परिजनों का दुलार उसे इस स्थिति में आराम दे सकता है। किसी भी तरह के जैल या टेबलेट का उपयोग करने से बचें। जैसा आपको पहले भी कहा गया है कि इस समय फ्लोराइड की मात्रा संतुलित रखें। फ्लोराइड को संतुलित रखना इसलिए ज़रुरी है क्योंकि इससे दांतों के कमज़ोर होने और सड़ने का डर रहता है।

पेसिफायर का इस्तेमाल करें

बच्चों के दांत आने के मामले में एक सबसे आम भ्रान्ति यह है कि हम दस्त लगने, सर्दी होने या अन्य लक्षणों को दांत के आने के साथ जोड़ देते हैं। असल में ऐसी कोई भी बात सीधे दांत के आने से नहीं जुड़ी होती। अमूमन दांत आने की उम्र में ही बच्चा घुटने चलना शुरू करता है, ऊपर का खाना शुरू करता है और हॉर्मोनल विकास की भी प्रक्रिया में होता है। ऐसे में नीचे का कुछ उठाकर मुंह मे डालने, कोई चीज ठीक से न पच पाने या शरीर मे हो रहे अन्य परिवर्तनों की वजह से वह सर्दी-ज़ुकाम, दस्त आदि जैसे लक्षण दर्शा सकता है। यूं दांत आने की प्रक्रिया बच्चे के लिए दर्द भरी तो होती ही है। इसलिए वह चिड़चिड़ाहट या सबका ध्यान आकर्षित करने जैसा व्यवहार दर्शा सकता है। इस समय कोशिश करें कि उसके पास रहें, उसका ध्यान उस तरफ से हटा दें और किसी अन्य मनोरंजक एक्टिविटी में उसका ध्यान लगा दें।

बच्चे के मसूढ़ों की उंगलियों से हल्के से मालिश करें, हल्की ठंडी चीजों का उपयोग करें जैसे कोई फल, सब्जी का टुकड़ा या गीला ठंडा टॉवल, आदि। आप लौंग तेल, विशेष पेसिफ़ायर या चिल्ड टीथिंग रिंग्स का भी उपयोग कर सकते हैं। पेसिफायर से बच्चा थोड़ी राहत महसूस करता है। बच्चों के गले मे टीथिंग रिंग्स आदि कभी न बांधें न ही लिक्विड से भरे टीथर्स बच्चे को दें। ओवर द काउंटर दवाइयां भी देने से बचें। यह एक सामान्य प्रक्रिया है जो समय पर प्राकृतिक रूप से पूरी हो जाती है। यदि बच्चा ज्यादा परेशान हो रहा हो तो डॉक्टर से राय अवश्य लें।

इस तरह से बेबी टीथ निकलने की प्रक्रिया आसानी से पूरी हो जाएगी।

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Dr. Prachita Agarwal

Dr. Prachita Agarwal

Pedodontist